भगवान दत्तात्रेय को हिंदू धर्म में त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) का संयुक्त अवतार माना जाता है, जो आदि गुरु और योग के प्रणेता हैं। महर्षि अत्रि और माता अनुसूया के पुत्र, दत्तात्रेय को तीन मुख और छह भुजाओं वाले ज्ञान के दिव्य स्वरूप में भी पूजा जाता है।
भगवान दत्तात्रेय हिंदू कैलेंडर के मार्गशीर्ष महीने की पूर्णिमा या पूर्ण चंद्र के दिन वह पृथ्वी पर अवतरित हुए थे और इसी तिथि के अनुसार भगवान दत्तात्रेय जयंती मनाई जाती है।
भगवान दत्तात्रेय के जन्म की कथा
माता अनुसूया, प्रजापति ऋषि कर्दम और माता देवहूति की नौ पुत्रियों में से एक थीं, वह खगोलशास्त्र के प्रणेता महर्षि अत्रि (अत्रि मुनि) की पत्नी थीं। उनकी पति के प्रति उनकी निष्ठा, सेवभाव, पातिव्रत्य आचरण और सतीत्व का तेज इतना प्रखर था कि देवी-देवता भी, जब उनके आश्रम के ऊपर से गुज़रते हुए दिव्य मार्ग से जाते थे, तो उस तेज को अनुभव करते थे। इसका प्रमाण उन्होंने त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) को बालक के रूप में परिवर्तित करके, उनको अपनी भक्ति की शक्ति और तेज से अवगत करवाया था।
सती अनसूया महर्षि अत्रि की पत्नी और कर्दम ऋषि की पुत्री थीं, जो अपने पतिव्रत धर्म, पवित्रता और तपस्या के लिए प्रसिद्ध हैं। कथा के अनुसार, माता अनसूया ने त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) द्वारा उनके तपस्वी तेज और सतीत्व की परीक्षा लेने पर नवजात शिशुओं के रूप में अपनी गोदी में खिलाया था।
कथा की अनुसार, त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) ने माता लक्ष्मी, माता सरस्वती और माता पार्वती के कहने पर, सती अनसूया के सतित्व की परीक्षा लेने का निर्णय लिया। वे ब्राह्मण के वेश में महर्षि अत्रि के आश्रम पहुंचे और माता से निर्वस्त्र होकर भोजन परोसने की अजीब शर्त रखी। माता अनसूया ने अपनी दिव्य शक्तियों और तपोबल से उन तीनों ब्राह्मणों को पहचान लिया और जल छिड़ककर उन तीनों को नवजात शिशुओं में बदल दिया और उन्हें स्तनपान कराया।
इस तरह शिशु रूप में बदल जाने के कारण जब, त्रिदेव वापस नहीं लौटे, तो देवियां (लक्ष्मी, सरस्वती, पार्वती) चिंताग्रस्त हो उनको ढूंढने अत्रि आश्रम पहुंचीं। वहाँ माता अनसूया ने तीनों शिशुओं को एक पालने में रख दिया और देवियों को अपने पति को पहचानने के लिए कहा, परंतु वे इसमें असमर्थ रहीं।
तब, देवियों ने माता से क्षमा मांगी, जिसके बाद माता अनसूया ने त्रिदेवों को उनका वास्तविक स्वरूप में लौटा दिया। प्रसन्न होकर त्रिदेवों ने उन्हें वरदान दिया कि वे उनके गर्भ से जन्म लेंगे। जिसके उपरांत माता अनसूया के गर्भ से ब्रह्मा के अंश से सोम/चंद्रमा/चंद्र, विष्णु के अंश से दत्तात्रेय और शिव के अंश से ऋषि दुर्वासा का जन्म हुआ।
14 वर्ष के वनवास के समय श्री राम, सीता और लक्ष्मण जी ने अनसूया के आश्रम में समय बिताया था। वहाँ पर माता अनसूया ने सीता को पतिव्रत धर्म की शिक्षा दी और उन्हें दिव्य वस्त्र-आभूषण दिए थे जो कभी मैले नहीं होते थे।
शाब्दिक अर्थों में अनसूया का अर्थ “ईर्ष्या या जलन से मुक्त” होता है। यह संस्कृत के ‘अन्’ (नहीं) और ‘असूया’ (ईर्ष्या/दोष खोजना) शब्दों से मिलकर बना है। यह दूसरों के गुणों में दोष न देखने, निंदा से मुक्त रहने, और पवित्रता का प्रतीक है।
भगवान दत्तात्रेय की पूजा
मार्गशीर्ष पूर्णिमा विशेष रूप से दत्तात्रेय की उपासना का एक प्रमुख दिन माना जाता है। इस दिन को दत्तात्रेय जयंती भी कहते हैं। इस अवसर पर पूजा विधि के अनुसार, भक्तों को भगवान दत्तात्रेय की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक जलाकर उनकी आरती करनी चाहिए, साथ ही भगवान के कई विशेष मंत्रों का जाप भी करना चाहिए।
भगवान दत्तात्रेय इन मंत्रों का उच्चारण भक्तों को मानसिक शांति और दिव्य ऊर्जा प्रदान करता है। इस पूजा के दौरान, भक्त फल, मिठाइयाँ और अन्य नैवेद्य समर्पित करते हैं।
मार्गशीर्ष माह में आने वाली पूर्णिमा तिथि का धार्मिक महत्व अधिक माना गया है, इसलिए इस दिन स्नान और जरुरतमन्द लोगों को दान देना शुभ माना जाता है।
भगवान दत्तात्रेय के मंत्र
- दत्तात्रेय का महामंत्र – ‘दिगंबरा-दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा’
- तांत्रोक्त दत्तात्रेय मंत्र – ‘ॐ द्रां दत्तात्रेयाय नम:’
- दत्त गायत्री मंत्र – ‘ॐ दिगंबराय विद्महे योगीश्रारय् धीमही तन्नो दत: प्रचोदयात’
भगवान दत्तात्रेय की पूजा विधि
1. साधक को सुबह जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए और साफ वस्त्र धारण करने चाहिए।
2. इसके बाद साधक चाहें तो मंदिर में जाकर या फिर अपने घर पर ही भगवान दत्तात्रेय की पूजा कर सकता है।
3. साधक को दत्तात्रेय की पूजा करने से पहले एक चौकी पर गंगाजल छिड़कर उस पर साफ वस्त्र बिछाना चाहिए और भगवान दत्तात्रेय की तस्वीर स्थापित करनी चाहिए।
4. इसके बाद भगवान दत्तात्रेय को फूल, माला आदि अर्पित करके उनकी धूप व दीप से विधिवत पूजा करनी चाहिए।
5. साधक को इस दिन भगवान के प्रवचन वाली अवधूत गीता और जीवनमुक्ता गीता अवश्य पढ़नी चाहिए।
भगवान दत्तात्रेय ने प्रकृति, मनुष्य और पशु-पक्षियों सहित 24 गुरु बनाए, जिनसे उन्होंने जीवन की सीख ली (जैसे पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आदि) उनको ‘अवधूत स्वरूप’ (जो सब बंधनों से मुक्त है) में भी पूजा जाता है। गिरनार (गुजरात) को उनका मुख्य निवास स्थान माना जाता है। भगवान दत्तात्रेय ने ‘अवधूत गीता’ और ‘त्रिपुरा रहस्य’ जैसे ग्रंथ महत्वपूर्ण और जीवन को दिशा देनेवाले ग्रंथों की रचना भी की।
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