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बांग्लादेश में हिंदू दमन का वह दौर और मोहम्मद यूनिस का समर्थन

जब हमारा पड़ोसी बांग्लादेश, मोहम्मद यूनिस नाम के एक जिहादी के शासन के अधीन था, उस समय पूरे बांग्लादेश में अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनिस की  शह और समर्थन से कट्टरपंथियों के द्वारा लूटपाट, अल्पसंख्यकों पर हमले, व्यभिचार और हिंसा का दौर चला था। पाकिस्तान की सेना के सहयोग से कुर्सी पर बैठा यूनिस भारत पर दबाब बनाने के लिए हिंदुओं को निशाना बनाने के लिए जनता को उकसाता था, यूनिस की शह पर होने वाली हिन्दू विरोधी हिंसा के समय पुलिस और सेना को या तो अलग रखा जाता था, या फिर कट्टरपंथियों के प्रति किसी भी प्रकार से एक्शन लेने की मनाही थी।

बांग्लादेश में यूनिस सरकार के समय हिंदुओं के नरसंहार (genocide) की कई घटनाएं हुई, लेकिन सरकार द्वारा मीडिया और सोशल मीडिया पर अंकुश लगा दिया गया था।

मोहम्मद यूनिस की शह पर हिंदुओं का नरसंहार (Hindu genocide in bangladesh )

अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनिस के शासन में  भारत या हिंदुओं की बात करने पर यूनिस की कट्टरपंथी भीड़ द्वारा सजा दी जाती थी।

हिन्दू धर्म मानने वालों के लिए वह बड़ा ही भयावह और कठिन समय था।

18 दिसम्बर को एक ऐसी ही रोंगटे खड़े करने वाली घटना हुई, जिसने बांग्लादेश की सांस्कृतिक विरासत और हिंदुओं और मुसलमानों की साझी बांग्ला-संस्कृति को झकझोर कर रख दिया था। इस ह्रदयाविदारक हिंसात्मक घटना में एक हिन्दू परिवार के दीपू चंद्र दास नामक व्यक्ति पर हमला किया गया, उन्हें एक पेड़ से लटका दिया गया और फिर आग लगा दी गई।

मोहम्मद यूनिस के शासन में दौर में बांग्लादेश में हिंदू महिलाओं के खिलाफ व्यभिचार और हिंसा की परेशान करने वाली अनेक आई हैं।

जब से भारत को अंग्रेजों से आज़ादी मिली है, तब से बांग्लादेश में हिंदू एक सताया हुआ अल्पसंख्यक समुदाय रहा हैं, और 1971 में बांग्लादेश की आज़ादी के बाद से तो उन पर होने वाले अत्याचारों में और भी बढ़ोतरी हुई है।

बांग्लादेश में हिन्दू

वर्ष 2022 की जनगणना के अनुसार बांग्लादेश में मुस्लिम के बाद, हिंदू धर्म दूसरा सबसे बड़ा धर्म है, जो देश की लगभग 7.95% आबादी और लगभग 13.1 मिलियन लोगों का प्रतिनिधित्व करता है।

बांग्लादेश में हिंदू समुदाय को 1947 में भारत के विभाजन के बाद से ही उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है, जो 1971 में बांग्लादेश की पाकिस्तान से स्वतंत्रता के बाद भी जारी रहा। पाकिस्तान की सेना द्वारा 1971 में बांग्लादेश नरसंहार के दौरान 30 लाख से भी अधिक लोग मारे गए, जिनमें हिंदुओं की संख्या अधिक थी। उस समय करीब 10 मिलियन से अधिक हिंदू शरणार्थी भारत आए थे।

200 साल के अंतराल में बांग्लादेश की हिंदू आबादी 95 % से घटकर आज 6-7 % के करीब (2022 जनगणना में हिन्दू आबादी 7.95%) रह गई है।

भारत और नेपाल के बाद बांग्लादेश में विश्व की तीसरी सबसे बड़ी हिंदू आबादी है। इसके 64 में से 61 जिलों में हिंदू धर्म दूसरा सबसे बड़ा धर्म है।

बांग्लादेश में सबसे बड़ा हिंदू समुदाय बंगाली हिंदुओं का है और जिनका खान-पान, रहन-सहन, संस्कृति और धार्मिक रीति-रिवाज भारत के मूल बंगाली हिंदुओं जैसे ही हैं।

दुनिया भर के हिंदुओं के लिए यह ज़रूरी है कि वे विश्व में अनेक देशों में हो रहे उत्पीड़न और हिंसा के प्रति अपनी स्व-चेतना को जाग्रत करें और इसके खिलाफ एकजुट होकर खड़े हों, आवाज उठायें।

यह देखना बेहद परेशान करने वाला और दर्दनाक है कि हिंदुओं से, केवल उनके धार्मिक विश्वासों के कारण, जीवन जीने का मूल अधिकार भी छीन लिया जाता है और पिछले कई दशकों में मुस्लिम देशों बिशेषतः पाकिस्तान, बांग्लादेश में लाखों हिंदुओं का सफाया किया जा चुका है।

जागरूक हिन्दू

बांग्लादेश में घटित हुआ, दास का मामला तो केवल एक ऐसा अपवाद है जो मीडिया की सुर्खियां बन पाया है, जबकि ऐसी न जाने कितनी ही आवाज़ों को हमेशा के लिए खामोश कर दिया गया है।

अकेले दिसंबर महीने में ही, खबरों के अनुसार, हिंदुओं के खिलाफ हिंसा की कम से कम 50 घटनाएं सामने आई हैं।

सभी हिंदुओं से यह आग्रह है कि वे पाकिस्तान और बांग्लादेश में रहने वाले हिंदुओं की दुर्दशा के बारे में, विश्व भर में जागरूकता फैलाएं उनकी दशा के बारे में अमेरिका से लेकर यूरोप तक सभी को अवगत करायें। विश्व में वह लोग सौभाग्यशाली हैं जिन्हें बिना किसी रोक-टोक के अपने धर्म का पालन करने की आज़ादी मिली हुई है, उन्हें उन लोगों के साथ मज़बूती से खड़ा होना चाहिए जिन्हें यह आज़ादी नसीब नहीं है।

-इति-

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