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ला बायाडेयर: ओस्लो में हिन्दू संस्कृति की छवि खराब करने वाला बैले फिर शुरू

ला बायाडेयर (मंदिर की नर्तकी) 19वीं सदी का एक क्लासिकल बैले है। जिसे मूल रूप से 1877 में मारियस पेटिपा द्वारा कोरियोग्राफ और लुडविग मिंकस द्वारा संगीतबद्ध किया गया था। इसमें प्राचीन भारत की पृष्ठभूमि पर आधारित एक मंदिर की नर्तकी (Bayadère) निकिया, योद्धा सोलोर, और राजकुमारी गामज़ाती के बीच प्रेम, ईर्ष्या और विश्वासघात की काल्पनिक कहानी का चित्रण है।

‘ला बायाडेयर’ (La Bayadère) बैले अपनी जटिल कोरियोग्राफी, विशेष रूप से “किंगडम ऑफ द शेड्स” (Kingdom of the Shades) दृश्य के लिए जाना जाता है। इसे दुनिया भर की प्रमुख बैले कंपनियों जैसे कि मैरिंस्की और बोल्शोई बैले द्वारा प्रस्तुत किया जाता है।

ओस्लो के ओपेरा हाउस के मुख्य मंच पर 17 अप्रैल से 14 मई तक “ला बायडेयर” के मंचन की घोषणा की गई है। हिंदुओं ने इस पुनर्मंचन को “कला प्रदर्शन के क्षेत्र में सांस्कृतिक संवेदनशीलता के लिए एक पीछे की ओर उठाया गया कदम” बताया है, और आगामी बैले प्रदर्शनों को तत्काल रद्द करने की मांग की है। इससे पहले, DNO&B द्वारा 23 मार्च से 7 अप्रैल, 2022 के बीच ओस्लो में इसका मंचन किया गया था।

जाने-माने हिंदू राजनेता राजन ज़ेड ने आज नेवादा (USA) में एक बयान में कहा कि यह बहुत दुख की बात है कि DNO&B, जो “पूरी तरह से नॉर्वे की सरकार के स्वामित्व में है”, ने पिछली अपीलों को नज़रअंदाज़ करते हुए, “दूसरों” की परंपराओं, तत्वों और अवधारणाओं के गलत इस्तेमाल को बेपरवाही से बढ़ावा देकर और पूरे समुदायों का मज़ाक उड़ाकर हिंदुओं की भावनाओं को फिर से ठेस पहुँचाने का फैसला किया।

यूनिवर्सल सोसाइटी ऑफ़ हिंदूइज़्म के अध्यक्ष ज़ेड, ने कहा कि, यह गंभीर सांस्कृतिक नुकसान को बार-बार खारिज करने जैसा था। इन मुद्दों को चार साल पहले ही संबंधित लोगों के सामने विस्तार से रखा गया था। DNO&B को ऐतिहासिक पूर्वाग्रहों का जश्न मनाना और उनसे मुनाफ़ा कमाना बंद कर देना चाहिए।

यूनिवर्सल सोसाइटी ऑफ हिंदूइज़्म (Universal Society of Hinduism) अमेरिका में स्थापित सामाजिक-धार्मिक संगठन है, जिसके अध्यक्ष राजन ज़ेड (Rajan Zed) हैं। यह संस्था हिंदू धर्म के सिद्धांतों को बढ़ावा देने, लोगों को शिक्षित करने और सकारात्मक सामाजिक-पर्यावरणीय बदलाव लाने के लिए काम करती है। सितंबर 2011 में स्थापित, यह संस्था मुख्य रूप से हिंदू धर्म के वैश्विक प्रतिनिधित्व पर केंद्रित है।

राजन ज़ेड ने संकेत दिया कि यह बेहद समस्याग्रस्त बैले एक समृद्ध सभ्यता का खुला अपमान था और इसमें 19वीं सदी की प्राच्यवादी मानसिकता झलकती थी। उन्होंने DNO&B से यह भी आग्रह किया कि वे इस तरह के अनुचित चयन के लिए माफ़ी माँगें और पहली बार में हिंदुओं की आपत्तियों के बारे में जानने के बावजूद इसे दोबारा प्रदर्शित करने के लिए भी माफ़ी माँगें।

ज़ेड ने कहा, नॉर्वेजियन नेशनल बैले, जो खुद को “नॉर्वे की शास्त्रीय बैले कंपनी” होने का दावा करता है, उसे “ला बायडेयर” (द टेम्पल डांसर) जैसे बैले को चुनने और फिर से प्रदर्शित करने से पहले कुछ परिपक्वता दिखानी चाहिए थी, जिसमें पूर्वी विरासत का अपमानजनक पश्चिमी चित्रण किया गया है और जातीय रूढ़िवादिता को बढ़ावा दिया गया है।

DNO&B के लिए यह बेहद गैर-जिम्मेदाराना बात है, कि वह बार-बार ऐसे बैले को चुने, जिस पर ओरिएंटलिस्ट रूढ़ियों के दोषपूर्ण मिश्रण, अमानवीय सांस्कृतिक चित्रण और गलत बयानी, अपमानजनक और नीचा दिखाने वाले तत्वों, सांस्कृतिक प्रतीकों के अनावश्यक इस्तेमाल, सारवाद, सतही विदेशीपन, व्यंग्यचित्रण आदि को बढ़ावा देने का आरोप लगा था।

DNO&B अपने विविध हितधारकों की सेवा के लिए इससे बेहतर काम कर सकता था; राजन ज़ेड ने यह बात कही।

ज़ेड ने नॉर्वे की संस्कृति और समानता मंत्री लुबना जाफ़री से भी आग्रह किया कि, जो “सांस्कृतिक नीति, समानता और भेदभाव-विरोधी नीति के लिए जिम्मेदार हैं”  वे DNO&B द्वारा सांस्कृतिक रूढ़ियों को बढ़ावा देने के इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करें, क्योंकि इसके बोर्ड की नियुक्ति नॉर्वे के संस्कृति मंत्रालय द्वारा की जाती है।

राजन ज़ेड ने पूछा कि, क्या नॉर्वे के संस्कृति और समानता मंत्रालय को भी अपनी जिम्मेदारियों के क्षेत्रों जैसे, संस्कृति, समानता और भेदभाव को और अधिक गंभीरता से नही लेना चाहिए?;

और अपने काम को अधिक प्रभावी ढंग से करने के लिए “दूसरों” की भावनाओं को बेहतर ढंग से नही समझना चाहिए?

क्या “ला बायडेयर” में सांस्कृतिक रूढ़ियों का मुद्दा मंत्रालय को दिखाई नहीं देता?

ज़ेड कहते हैं, यदि हमारी अपीलें नहीं सुनी जाती हैं, तो हम नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोर से अपील करने की योजना बना रहे हैं; क्योंकि करदाताओं के पैसे को बार-बार “अन्य” संस्कृतियों का व्यंग्यचित्रण करने पर खर्च करना सरासर अनुचित, अनैतिक और अनुचित है; उन्होंने कहा कि मेहनती हिंदुओं ने नॉर्वे की समृद्धि में बहुत योगदान दिया है और आगे भी ऐसा करते रहेंगे।

इसके अलावा, राजन ज़ेड ने कहा कि DNO&B के सहयोगियों जैसे, Norsk Tipping, OBOS, DNB को इसके साथ अपने संबंधों पर फिर से विचार करना चाहिए, अगर यह ‘ला बायाडेयर’ (La Bayadère) जैसे बैले का प्रदर्शन जारी रखता है, और जो “दूसरों” की परंपराओं को तुच्छ बनाता है।

ज़ेड ने DNO&B के CEO Geir Bergkastet, बोर्ड की चेयरपर्सन Sarah Willand, और बैले की आर्टिस्टिक डायरेक्टर Ingrid Lorentzen को सुझाव दिया कि वे अपनी प्रणालियों और प्रक्रियाओं का पुनर्मूल्यांकन करें, और अपने अधिकारियों को सांस्कृतिक संवेदनशीलता प्रशिक्षण के लिए भेजें, ताकि भविष्य में ऐसी अनुचित सामग्री बार-बार सामने न आए।

DNO&B की वेबसाइट पर तीन घंटे लंबे “ला बायाडेयर” के विवरण में यह शामिल है: “इस कृति में ऐसे तत्व भी हैं जिनसे पहचान बनाना या जिनका समर्थन करना कठिन है। इसी कारण से, कई बैले हाउस अब यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या इस तरह की और अन्य क्लासिक कृतियों का उनके प्रदर्शनों की सूची में अभी भी कोई उचित स्थान है।”

2022 के विरोध प्रदर्शन के दौरान, DNO&B के संचार निदेशक Kenneth Fredstie ने राजन ज़ेड (जिन्होंने इस विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया था) को भेजे गए एक ईमेल में स्वीकार किया कि “La Bayadère” में “अन्य संस्कृतियों के प्रति आकर्षण तो है, लेकिन साथ ही उनके बारे में अज्ञानता भी झलकती है।”

यूनिवर्सल सोसाइटी ऑफ़ हिंदूइज़्म के अध्यक्ष राजन ज़ेड ने कहा कि हम “कलात्मक स्वतंत्रता” का पूरी तरह समर्थन करते हैं, लेकिन तब नहीं जब वह हमारे संस्कृति को विकृत करे और उन्हें तुच्छ बनाए।

“कलात्मक स्वतंत्रता” का मतलब यह नहीं है कि आप बार-बार “अन्य” समुदायों को विकृत करें, उन्हें तुच्छ बनाएं और उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचाएं; जबकि चुनने के लिए इतने सारे अन्य बैले उपलब्ध हैं।

जब परंपराओं को अनुचित तरीके से और गलत ढंग से चित्रित किया जाता है, तो इससे गलतफहमियां बढ़ सकती हैं और यह समुदायों के लिए कष्टदायक हो सकता है। ज़ेड ने कहा कि DNO&B सांस्कृतिक सम्मान और कलात्मक जवाबदेही के समकालीन मानकों के अनुरूप नहीं है।

कई अन्य लोगों की तरह, हिंदू भी बैले को एक सम्मानित कला रूप मानते हैं, जो समृद्धता और गहराई प्रदान करता है। लेकिन अब हम 21वीं सदी में काफी आगे बढ़ चुके हैं, और पुराना हो चुका ‘ला बायाडेयर’ (La Bayadère), जिसे पहली बार 1877 में सेंट पीटर्सबर्ग (रूस) में प्रस्तुत किया गया था; अब वैश्विक मंच से हमेशा के लिए विदा लेने का हकदार है।

 

द्रविड़ शैली में निर्मित भारत के प्रसिद्ध कोविल

"विशिष्ट कोविल" (Specific or Unique Temple) का अर्थ है ऐसा मंदिर (कोविल) जो अपनी वास्तुकला, इतिहास, चमत्कारों, वैज्ञानिक महत्व या किसी अनोखी धार्मिक परंपरा के कारण आम मंदिरों से बिल्कुल अलग और अद्वितीय होता है। यह कोविल शब्द दो शब्दों के मेल से बना है, जिसमें 'को' (Ko) का अर्थ होता है 'राजा' या 'भगवान' और इल (Il) का अर्थ होता है 'घर' या 'निवास'; इसलिए, कोविल का शाब्दिक अर्थ है "भगवान का घर"। भारत की प्राचीन भाषाओं या उनसे बनी अन्य बोलचाल की भाषा में इसे देवालय, देवस्थान (देवों का स्थान), मंदिर, मण्डप इत्यादि भी कहा जाता है।

मंदिर और देवालय में क्या अंतर है?

देवालय का अर्थ विशेष रूप से किसी एक साधारण धार्मिक स्थल से जुड़ा होता है, जबकि मंदिर एक संगठित और भव्य निर्माण हो सकता है, जो विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों और समारोहों के लिए उपयुक्त होता है। मंदिर की संरचना और आचार विचार अधिक जटिल होते हैं और इसे आमतौर पर पूरे समुदाय द्वारा पूजा के लिए उपयोग किया जाता है। इसी प्रकार, देवालय अपने आकार या संरचना में छोटे हो सकते हैं और इनमें पूजा की जा सकने वाली साधारण जगहें होती हैं।समाज में देवालय और मंदिर दोनों का अपनी-अपनी विशेष भूमिकाएँ हैं। जहाँ एक ओर देवालय व्यक्तिगत या छोटे समूहों की पूजा के लिए उपयुक्त होता है, वहीं मंदिर सामूहिक पूजा, त्योहारों और समारोहों जैसे सामाजिक गतिविधियों का केंद्र होता है। यह भिन्नता हर धार्मिक परंपरा में दृष्टिगोचर होती है, प्रत्येक ने अपने स्थानों को वेद, उपनिषदों और अन्य धार्मिक ग्रंथों के अनुसार निर्मित किया है।

भोजशाला एक हिंदू मंदिर है: न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला

मध्य प्रदेश के धार में स्थित ऐतिहासिक ‘भोजशाला’ हिंदुओं का पवित्र श्री वाग्देवी (श्री सरस्वती) मंदिर है। यह पुष्टि इंदौर उच्च न्यायालय ने सभी साक्ष्यों के आधार पर की है। हिंदुओं के लिए यह फैसला केवल किसी इमारत की जीत नहीं है, बल्कि उस ऐतिहासिक सत्य की एक भव्य विजय है जिसे सदियों से दबाकर रखा गया था। यह विजय हिंदुओं के लिए, विदेशी इस्लामी आक्रमणकारियों (मुस्लिम आक्रान्ताओं) द्वारा अतिक्रमित मंदिरों को मुक्त कराने के चल रहे प्रयासों की दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम है।

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