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कालहस्ती में पंचभूत शिव जी की वायुलिंगम रूप में पूजा

पंचभूत या पंचतत्व लिंगों में से एक वायुलिंगम या वायुलिंग के लिए प्रसिद्ध श्री कालहस्ती मंदिर दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश राज्य के चित्तूर जिले में पेन्नार नदी की शाखा स्वर्णामुखी नदी के तट पर स्थित कालहस्ती नामक नगर में है।

इसको दक्षिण भारत की काशी (Kashi of South India) के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और इसका इतिहास बहुत ही रोचक है जो इस लेख में आगे उपलब्ध है।

कालहस्ती मंदिर

दक्षिण भारत में स्थित भगवान शिव के मंदिरों और तीर्थस्थानों में इस मंदिर का विशेष महत्व है। यह भगवान भोलेनाथ शिव जी के वायुलिंग या वायु तत्व को समर्पित है। श्री कालहस्ती मंदिर, आंध्रप्रदेश के चित्तूर जिले में स्थित कालहस्ती नामक नगर में स्वर्णामुखी नदी के तट पर है। श्रीकालहस्ती तीर्थ स्वर्णामुखी नदी के तट से पर्वत की तलहटी तक फैला हुआ है और इसे ‘दक्षिण कैलाश’ के नाम से भी जाना जाता है।

मंदिर के पार्श्व में तिरुमलय की पहाड़ी दिखाई देती हैं श्री कालहस्ती मंदिर की वास्तुकला द्रविड़ शैली की है, जिसमें मंदिर का शिखर दक्षिण भारतीय शैली का सफ़ेद रंग का है।

श्रीकालहस्ती मंदिर के तीन विशाल गोपुरम हैं जो स्थापत्य की दृष्टि से अनुपम हैं इनमें से मंदिर एक विशाल गोपुरम है, जो सात मंजिला है और बहुत ही सुंदर दिखता है। मंदिर के अंदर कई मंडप और गर्भगृह हैं। मंदिर में सौ स्तंभों वाला मंडप भी है, जो अपने आप में अनोखा है।

मंदिर की दीवारों पर देवी-देवताओं की सुंदर मूर्तियाँ उकेरी गई हैं।

यहां भगवान ‘कालहस्तीश्वर’ के संग देवी ‘ज्ञानप्रसूनअंबा’ भी विराजमान हैं। मंदिर का अंदरूनी भाग लगभग ५वीं शताब्दी का बना है और बाहरी भाग बाद में १२वीं शताब्दी में निर्मित होने का अनुमान है।

कालहस्ती के तीर्थस्थल

श्री कालहस्ती मंदिर के पास और भी धार्मिक स्थल, मंदिर हैं, जैसे ‘विश्वनाथ मंदिर’; शिवभक्त ‘कन्नप्पा’ मंदिर (श्री कणप्पा); ‘मणिकणिका मंदिर’; सूर्यनारायण मंदिर, ‘भारद्वाज तीर्थम’; कृष्णदेवराय मंडपम, श्री सुख ब्रह्माश्रम, वैय्यालिंगाकोण (सहस्त्र लिंगों की घाटी), पर्वत पर स्थित दुर्गम मंदिर और दक्षिण काली मंदिर इनमें से प्रमुख हैं।

यहां का समीपस्थ हवाई अड्डा तिरुपति शहर में, तिरुपति विमानक्षेत्र है, जो यहाँ से बीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। ट्रेन द्वारा, चेन्नई-विजयवाड़ा रेलवे लाइन पर स्थित गुंटूर व चेन्नई से भी इस स्थान पर आसानी से पहुँचा जा सकता है। विजयवाड़ा से तिरुपति जाने वाली लगभग सभी रेलगाड़ियां कालहस्ती पर अवश्य रुकती हैं। आंध्र प्रदेश परिवहन की बस सेवा तिरुपति से बहुत ही कम अंतराल पर इस स्थान के लिए उपलब्ध है।

श्री कालहस्ती मंदिर की उत्पति

धार्मिक मान्यता अनुसार इस स्थान का नाम तीन पशुओं – “श्री” यानी मकड़ी, “काल” यानी सर्प तथा “हस्ती” यानी हाथी के नाम पर किया गया है। ये तीनों ही यहां शिव की आराधना करके मुक्त हुए थे। जनुश्रुति के अनुसार मकड़ी ने शिवलिंग पर तपस्या करते हुए जाल बनाया था और सांप ने लिंग से लिपटकर आराधना की और हाथी ने शिवलिंग को जल से स्नान करवाया कर प्रसन्न किया था। यहाँ पर इन तीनों “श्री”,”काल” और  “हस्ती” की मूर्तियाँ भी स्थापित हैं।

श्रीकालहस्ती का उल्लेख स्कंद पुराण, शिव पुराण और लिंग पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है। स्कंद पुराण के अनुसार एक बार इस स्थान पर अर्जुन ने प्रभु कालहस्तीवर का दर्शन किया था। तत्पश्चात पर्वत के शीर्ष पर ‘भारद्वाज मुनि’ के भी दर्शन किए थे। कहते हैं ‘कणप्पा’ (कन्नप्पा) नामक एक भक्त  ने यहाँ पर भगवान शिव की आराधना की थी और उन्हें मोक्ष प्राप्त हुआ था।

यह श्री कालहस्ती मंदिर राहुकाल पूजा के लिए विशेष रूप से जाना जाता है।

सनातन धर्म  में पंचतत्व का सार

जीवन और विभिन्न प्रजातियाँ,  ग्रह-मंडलों और प्रकृति की पाँच अभिव्यक्तियों अर्थात् पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और अंतरिक्ष के संयोजन से उत्पन्न हुई हैं।

मानव शरीर और पृथ्वी की संरचना एक जैसी है – ¾ (75%) जल और ¼ (25%) अन्य तत्व। यदि सटीक रूप से कहें तो, मानव शरीर 72% जल, 12% पृथ्वी, 6% वायु, 4% अग्नि और 6% आकाश/अंतरिक्ष से बना है।

प्राचीन एवं उन्नत भारतीय चिकित्सा प्रणाली आयुर्वेद के अनुसार, पंचभूत के साथ शरीर का संतुलन त्रिदोषों जैसे, “कफ”, “पित्त”, वायु (गैस), धातु और मल (अपशिष्ट उत्पाद) के सिद्धांतों द्वारा ही नियंत्रित होता है।

प्रत्येक योगिक अभ्यास 5 (पंच) भूतों को शुद्ध करने के बारे में है, जो अंततः शुद्ध शरीर, मन और आत्मा की ओर ले जाता है।

पंचभूत मंदिर पांच शिव मंदिर हैं जो एक-एक भूत (तत्व) को समर्पित हैं और पंचभूत स्थल, शिव को समर्पित पांच मंदिरों को पंचभूत को संदर्भित करता है, जिसमें प्रत्येक मंदिर, प्रकृति के पांच प्रमुख तत्वों पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश की अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है

पंच का अर्थ है “पांच”, भूत का अर्थ है “तत्व,” और स्थल का अर्थ है “स्थान” या मंदिर है। यह पंचभूत, भारत के तमिलनाडु राज्य में चार स्थान पर और आंध्र प्रदेश में एक स्थान पर स्थित हैं।

पंचतत्व शिवलिंग का तार्किक महत्व

सृष्टि में त्रिनेत्रधारी शिव के पांच मुखों से ही पांच तत्वों जल, वायु, अग्नि, आकाश, पृथ्वी की उत्पत्ति हुई, और माना जाता है कि यह पाँचों तत्व दक्षिण भारत में विभिन्न स्थानों पर पाँच शिव लिंगों में समाहित हैं तथा प्रत्येक लिंग का नाम उस तत्व के आधार पर रखा गया है।

1. पृथ्वी तत्व (Prithvi): कांचीपुरम, तमिलनाडु में स्थित ‘एकम्बरेश्वर मंदिर’ (पृथ्वी लिंगम; Ekambareswarar Temple); यहाँ का शिवलिंग मिट्टी से बना है और इसे पृथ्वी के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है।

2. जल तत्व (Jala): जंबुकेश्वर मंदिर (जम्बुकेश्वर मंदिर), तिरुवनैकवल (Thiruvanaikovil) भारत के तमिलनाडु राज्य के तिरुचिरापल्ली जिले में स्थित है। यहाँ शिवलिंग के नीचे हमेशा जल प्रवाहित होता रहता है और यह शिवलिंग जल का प्रतीक माना जाता है।

3. अग्नि तत्व (Agni): अरुणाचलेश्वर मंदिर (अन्नामलाईयार मंदिर) तमिलनाडु के तिरुवन्नामलाई में स्थित है, जो अरुणाचल पर्वत की तलहटी में बसा है। यह अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करने वाले पंचभूत स्थलों में से एक है और यहाँ शिव को ‘ज्योति’ या अग्नि के रूप में पूजा जाता है।

4. वायु तत्व (Vayu): श्री कालहस्तीश्वर मंदिर, आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में स्वर्णमुखी नदी के तट पर स्थित कालहस्ती में है। यह मंदिर हिन्दू धर्म के प्रसिद्ध ‘पंचभूत स्थलों’ में से एक है, यह मंदिर वायु तत्व लिंग (वायु लिंगम) का प्रतिनिधित्व करता है। यह मंदिर भीतर गर्भग्रह में रहस्यमयी वायु की उपस्थिति, राहु-केतु पूजा और वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है।

5. आकाश तत्व (Akasha): थिल्लई नटराज मंदिर (‘Thillai Nataraja Temple’; या ‘Chidambaram Nataraja Temple’) या चिदंबरम, तमिलनाडु राज्य में स्थित है। थिल्लई नटराज मंदिर भगवान शिव के ‘नटराज’ (‘ब्रह्मांडीय नर्तक’) रूप को समर्पित है, और यह स्थान ‘पंच भूत स्थलों’ में से एक है, जो आकाश (अंतरिक्ष) तत्व का प्रतिनिधित्व करता है।

यह मंदिर दुनिया के चुंबकीय भूमध्य रेखा (Magnetic Equator) के केंद्र बिंदु पर स्थित है।

थिल्लई नटराज मंदिर में चिदंबर रहस्यम (Chidambara Rahasyam) गर्भगृह में ‘निराकार शिव’ आकाश या अनंत की पूजा की जाती है।

हिन्दू धर्म में इन पंचतत्व शिवलिंग मंदिरों की यात्रा और दर्शन को जीवन में तत्वों के संतुलन और आत्म-साक्षात्कार (मोक्ष) के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है।

आश्चर्यजनक है की यह सभी पंचतत्व शिवलिंग मंदिर 78°E और 79°E देशांतरों और 10°N और 14°N अक्षांशों के बीच स्थित हैं।

कालहस्ती का वायुलिंगम मंदिर

श्री कालहस्ती मंदिर दक्षिण के पंचतत्व लिंगों में से वायु तत्व का शिवलिंग है। यहाँ वायु तत्व के लिए शिवलिंग या वायु लिंगम के रूप में श्रीकालहस्तीश्वर की पूजा की जाती है। यह कालहस्तीश्वर मंदिर राहु-केतु दोष निवारण के लिए भी प्रसिद्ध है।

श्री कालहस्तीश्वर मंदिर में मंद वायु के होने का रहस्य आश्चर्यजनक है यहाँ गर्भग्रह में शिवलिंग के समीप दीपक हमेशा टिमटिमाता रहता है, जो वायु की उपस्थिति दर्शाता है। मंदिर के इतने अंदर वायु की इस प्रकार की उपस्थिति इस स्थान को शिव कृपा और भगवत कृपा से परिपूर्ण बनाती है।

वायूलिङ्गं के रूप में स्थापित शिव जी के इस मंदिर को ग्रहण के दोष से मुक्त माना जाता है और इसलिए यह श्री कालहस्ती मंदिर सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के समय भी खुला रहता है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को भगवान शिव और मां पार्वती का विवाह हुआ था और इस दिन को महाशिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है।

शिवभक्त इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा, व्रत और भजन कीर्तन के साथ रात्रि जागरण करते हैं।

महाशिवरात्रि के अवसर पर श्री कालहस्ती मंदिर में विशेष आयोजन किए जाते हैं। इस दिन यहाँ पर भगवान शिव के वायुलिंग की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और कई धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। महाशिवरात्रि के दिन यहाँ का दर्शन करना बहुत ही शुभ माना जाता है।

कैसे पहुंचे श्री कालहस्ती मंदिर ?

श्री कालहस्ती मंदिर आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में स्थित है। यह मंदिर आंध्र प्रदेश की राजधानी विशाखापट्टनम से करीब 720 किमी है। इसके अलावा, तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई से महज 116 किमी दूर स्थित है। यह तिरुपति से सिर्फ 41 किमी की दूरी पर स्थित है। यहाँ का निकटतम हवाई अड्डा और रेलवे स्टेशन तिरुपति है। तिरुपति से आप बस या टैक्सी के द्वारा श्रीकालहस्ती पहुँच सकते हैं।

इस मंदिर में सुबह 6 बजे से लेकर शाम 5 बजे के बीच में दर्शन कर सकते हैं। मंदिर में राहु केतु पूजा आदि विशेष पूजा के लिए अलग व्यवस्था है जो प्रदेश सरकार की वेबसाईट पर उपलब्ध है। श्री कालहस्ती मंदिर में महाशिवरात्रि के मौके हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। सर्दियों के समय में यहां का मौसम बहुत अनुकूल होता है।

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