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मुल्तान का प्रह्लादपुरी मंदिर जहाँ से होली की शुरुआत हुई थी

पाकिस्तान के मुल्तान में स्थित प्रह्लादपुरी मंदिर एक प्राचीन हिंदू मंदिर है, जो भगवान नरसिंह को समर्पित है और भक्त प्रह्लाद द्वारा निर्मित माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह वही स्थान है जहाँ असुर राजा हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रह्लाद को भगवान विष्णु ने अग्नि से बचाया था। माना जाता है कि इसी स्थान पर भगवान नरसिंह (आधे मनुष्य, आधे सिंह के रूप में) एक खंभे से प्रकट हुए थे और अत्याचारी राजा हिरण्यकश्यप का वध किया था।

होली उत्सव का जन्मस्थान

पाकिस्तान में हिंदुओं के दमन से पहले क्षेत्र के श्रद्धालु “होलिका दहन” के प्रतीक के रूप में बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाने के लिए यहाँ एकत्र होते थे। यह होली के त्योहार का जन्मस्थान भी माना जाता है।

जहाँ हिरण्यकशिपु की बहन होलिका ने अपने भतीजे और हिरण्यकशिपु के पुत्र भगवान भक्त प्रहलाद को जलाने का प्रयास किया था।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह वही स्थान है जहाँ असुर राजा हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रह्लाद को भगवान विष्णु ने अग्नि से बचाया था। माना जाता है कि इसी स्थान पर भगवान नरसिंह (आधे मनुष्य, आधे सिंह) एक खंभे से प्रकट हुए थे और अत्याचारी राजा का वध किया था। सदियों तक, क्षेत्र के श्रद्धालु “होलिका दहन” के प्रतीक के रूप में बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाने के लिए यहाँ एकत्र होते थे।

वर्ष 1992 में कट्टरपंथी मानसिकता से ग्रसित मुस्लिमों द्वारा तोड़े जाने के बाद यह खंडहर में तब्दील हो गया है। प्रह्लादपुरी मंदिर तोड़े जाने का विरोध न तो पाकिस्तान के किसी राजनैतिक दल, व्यक्ति या संस्था ने किया और न ही सरकार की तरह से इसकी सुरक्षा के लिए कोई पहल की गई।

भगवान नृसिंह रुपी भगवान विष्णु द्वारा हिरण्यकशिपु का वध और हाथ जोड़े हुए प्रह्लाद और कयाधु

मुल्तान में कट्टरपंथी मुस्लिम समाज द्वारा ध्वस्त ऐतिहासिक प्रह्लादपुरी मंदिर आज भी मलबे के रूप में मौजूद है जो, आसपास रहने वालों के लिए बस मिट्टी का एक ढ़ेर मात्र है।

वर्तमान में, यह इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (ETPB) की संपत्ति है। लेकिन इसके पुनः निर्माण के लिए अभी तक कोई कदम नही उठाया गया और न ही आसपास हो रहे अतिक्रमण को रोकने या हटाने के लिए।

भगवान नरसिंह का प्रकटत्व

इस एतिहासिक प्रह्लादपुरी के मूल मन्दिर का निर्माण हिरण्यकश्यपु के पुत्र भक्त प्रह्लाद द्वारा किया गया था। कहा जाता है कि वर्तमान, मन्दिर उस स्थान पर स्थित है जहाँ मूल मन्दिर का निर्माण प्रह्लाद ने स्वयं किया था और यह वह स्थान है जहाँ भगवान नरसिंह ने हिरण्यकशिपु से प्रह्लाद को बचाने के लिए स्तम्भ के बाहर प्रकट हुए थे। इसलिए होली के त्योहार और उत्सव की सांस्कृतिक परंपरा की शुरुआत इसी मन्दिर से हुई थी।

पौराणिक कथाओं के अनुसार आदिकाल में इस स्थान पर भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार लेकर हिरण्यकशिपु का वध करके भक्त प्रह्लाद की रक्षा की थी।

इस स्थान का हिंदुओं के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक होली से गहरा संबंध है और इस स्थान को होली के त्योहार की जन्मस्थली भी माना जाता है। होली के उत्सव की परंपरा सबसे पहले यहीं प्रह्लादपुरी मंदिर से शुरूहुई मानी जाती है।

मुस्लिम आक्रताओं और उनकी कुत्सित मानसिकता के चलते कई शताब्दियों पहले से ही इस स्थान और इसकी इमारत को मामूली निर्माण करके किला बना दिया गया था। यह मुल्तान किले के भीतर, हज़रत बहाउद्दीन ज़कारिया की मज़ार के पास स्थित है।

प्रह्लादपुरी मन्दिर का इतिहास

पाकिस्तान में मुल्तान का प्राचीन नाम प्रह्लादपुरी था, यह भक्त प्रह्लाद के राज्य की राजधानी और भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार का उद्गम स्थल था। इसे मूलस्थान (मूला-स्थान) के नाम से जाना जाता था, क्योंकि यह नरसिंह का उद्गम स्थल था।

प्राचीन काल में इस क्षेत्र का नाम ऋषि कश्यप के नाम पर कश्यपपुरी रखा गया था, जहाँ उनके बेटे हिरण्यकश्यप ने अपना साम्राज्य बनाया था। भगवान नरसिंह द्वारा हिरण्यकश्यप के वध के उपरांत उनके पुत्र प्रह्लाद ने यहाँ नरसिंह जी का एक विशाल मंदिर बनवाया था। लेकिन कालान्तर में इस मंदिर को अलग-अलग मुस्लिम हमलावरों ने कई बार तोड़ा, फिर हिन्दू राजाओं और संतों ने पुनः निर्माण करवाया।

एतिहासिक प्रह्लादपुरी के मूल मन्दिर में एक खंभों वाली संरचना थी, और इसकी छत तथा इसे सहारा देने वाले खंभे शुद्ध सोने के बने थे। जीन डी थेवेनोट ने 1665 में अपनी यात्रा के दौरान इस जगह पर एक मंदिर होने का ज़िक्र किया है।

Jean de Thévenot
Jean de Thévenot (16 June 1633 – 28 November 1667) was a French traveller in Asia, who wrote extensively about his journeys. He was also a linguist, natural scientist and botanist.

जीन डी थेवेनोट (Jean de Thevenot) 17वीं शताब्दी के एक फ्रांसीसी यात्री, भाषाविद् और वनस्पतिशास्त्री थे। उन्हें मुख्य रूप से पूर्व (एशिया) की उनकी विस्तृत यात्राओं और उनके लिखे गए यात्रा वृत्तांतों के लिए जाना जाता है, जो उस समय के समाज, संस्कृति और राजनीति की सटीक जानकारी देते हैं।

हिन्दू मंदिर को ध्वस्त किया

मुल्तान में प्रसिद्ध सूर्य मन्दिर की तरह प्रह्लादपुरी मन्दिर भी मुस्लिम आक्रान्ताओं ने विजय के बाद नष्ट कर दिया था। 1810 के दशक में इस क्षेत्र पर सिखों के शासन के कार्यकाल में मन्दिर का पुनर्निर्माण किया गया था, जिसके कलश और गुंबद को कालांतर में पुनः ध्वस्त कर दिया गया था।

1831 में मन्दिर का दौरा करने वाले ब्रिटिश यात्री अलेक्जेण्डर बर्नेस (अलेक्ज़ेंडर बर्न्स (Sir Alexander Burnes) या सिकंदर बर्न्स एक ब्रिटिश यात्रावृत्त लेखक तथा जासूस) ने भी अपनी यात्रा कथा में कहा कि उन्होंने इसे बिना छत के सूनसान पाया था।

सत्ता के लोलुप अति-महत्वाकांक्षी व्यक्ति जिन्ना (जन्म से हिन्दू) ने अंग्रेजों से मिलकर भारत को विभाजित कर मुस्लिम देश पाकिस्तान के निर्माण के बाद जब, अधिकांश हिन्दू भारत चले आए, तब से इस मन्दिर का प्रबन्धन नगर के अल्पसङ्ख्यक हिन्दुओं द्वारा किया जाता रहा।

भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान, जब मुल्तान में स्थित ऐतिहासिक प्रह्लादपुरी मंदिर खतरे में था, तब संत बाबा नारायण दास बत्रा, भगवान नृसिंह की मूल मूर्ति को वहां से सुरक्षित निकाल कर भारत लाए थे।

वर्ष 1947 में पाकिस्तान बनने के बाद सरकार की शह पर वहाँ की एतिहासिक, सांस्कृतिक हिन्दू विरासत और परम्परायों को नष्ट करने का काम शुरू किया गया। राजनैतिक दलों और राजनैतिज्ञों द्वारा वोट बैंक तथा सत्ता में प्रभाव के लिए मुस्लिम कट्टरपंथी समूह, धर्म-गुरुओं और आतंकवादी समूहों का गठजोड़ किया गया, अल्पसंख्यक समुदाओं, विशेषकर हिंदुओं पर धर्म परिवर्तन के लिए दबाब बनाया गया। उनके प्राचीन और पौराणिक काल के पूजा स्थलों, हिन्दू मन्दिरों को द्वारा ढहा दिया गया, जिनमें से यह एक मंदिर भी था।

संत बाबा नारायण दास बत्रा

विभाजन के बाद हिंदुओं के पलायन के समय 1947 में मुल्तान (पाकिस्तान) के प्रसिद्ध प्रह्लादपुरी मंदिर से भगवान नृसिंह की प्राचीन मूर्ति को भारत लाने की दूरदर्शी सोच के लिए संत बाबा नारायण दास बत्रा इतिहास में अमर माने जाते हैं। वह भगवान विष्णु के अनन्य भक्त और एक तपस्वी संत थे।

संत बाबा नारायण दास बत्रा जी द्वारा मुल्तान (पाकिस्तान) के पौराणिक काल के  प्रह्लादपुरी मंदिर से लाई गई भगवान नृसिंह की प्राचीन मूर्ति वर्तमान में हरिद्वार के सप्त ऋषि मार्ग पर स्थित नृसिंह धाम में स्थापित है।

वे भगवान विष्णु के अनन्य भक्त और एक तपस्वी संत थे। उन्हें मुल्तानी सनातन परंपराओं को भारत में पुनर्जीवित करने और नृसिंह अवतार की उपासना को बढ़ावा देने के लिए जाना जाता है।

विभाजन के बाद हिंदुओं के पलायन के समय 1947 में प्रह्लादपुरी मन्दिर में रखी भगवान नृसिंह की मूल मूर्ति, प्रसिद्ध वयोवृद्ध सन्त बाबा नारायण दास बत्रा द्वारा भारत में लाई गई जो आज हरिद्वार के एक मंदिर में स्थापित है जिसे

विभाजन के बाद, पाकिस्तान के कई शहरों, हिन्दू धार्मिक स्थानों पर मौजूद अधिकांश हिंदू आबादी, कट्टरपंथी मुस्लिमों द्वारा प्रताड़ित होकर भारत आ गई, जिससे मंदिरों की संपत्ति, उनका भंडार स्थानीय मुस्लिम बहुसंख्यक आबादी की देखरेख में आ गए। उंसके बाद धीरे-धीरे समाप्त होते गए।

-इति-

 

द्रविड़ शैली में निर्मित भारत के प्रसिद्ध कोविल

"विशिष्ट कोविल" (Specific or Unique Temple) का अर्थ है ऐसा मंदिर (कोविल) जो अपनी वास्तुकला, इतिहास, चमत्कारों, वैज्ञानिक महत्व या किसी अनोखी धार्मिक परंपरा के कारण आम मंदिरों से बिल्कुल अलग और अद्वितीय होता है। यह कोविल शब्द दो शब्दों के मेल से बना है, जिसमें 'को' (Ko) का अर्थ होता है 'राजा' या 'भगवान' और इल (Il) का अर्थ होता है 'घर' या 'निवास'; इसलिए, कोविल का शाब्दिक अर्थ है "भगवान का घर"। भारत की प्राचीन भाषाओं या उनसे बनी अन्य बोलचाल की भाषा में इसे देवालय, देवस्थान (देवों का स्थान), मंदिर, मण्डप इत्यादि भी कहा जाता है।

मंदिर और देवालय में क्या अंतर है?

देवालय का अर्थ विशेष रूप से किसी एक साधारण धार्मिक स्थल से जुड़ा होता है, जबकि मंदिर एक संगठित और भव्य निर्माण हो सकता है, जो विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों और समारोहों के लिए उपयुक्त होता है। मंदिर की संरचना और आचार विचार अधिक जटिल होते हैं और इसे आमतौर पर पूरे समुदाय द्वारा पूजा के लिए उपयोग किया जाता है। इसी प्रकार, देवालय अपने आकार या संरचना में छोटे हो सकते हैं और इनमें पूजा की जा सकने वाली साधारण जगहें होती हैं।समाज में देवालय और मंदिर दोनों का अपनी-अपनी विशेष भूमिकाएँ हैं। जहाँ एक ओर देवालय व्यक्तिगत या छोटे समूहों की पूजा के लिए उपयुक्त होता है, वहीं मंदिर सामूहिक पूजा, त्योहारों और समारोहों जैसे सामाजिक गतिविधियों का केंद्र होता है। यह भिन्नता हर धार्मिक परंपरा में दृष्टिगोचर होती है, प्रत्येक ने अपने स्थानों को वेद, उपनिषदों और अन्य धार्मिक ग्रंथों के अनुसार निर्मित किया है।

भोजशाला एक हिंदू मंदिर है: न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला

मध्य प्रदेश के धार में स्थित ऐतिहासिक ‘भोजशाला’ हिंदुओं का पवित्र श्री वाग्देवी (श्री सरस्वती) मंदिर है। यह पुष्टि इंदौर उच्च न्यायालय ने सभी साक्ष्यों के आधार पर की है। हिंदुओं के लिए यह फैसला केवल किसी इमारत की जीत नहीं है, बल्कि उस ऐतिहासिक सत्य की एक भव्य विजय है जिसे सदियों से दबाकर रखा गया था। यह विजय हिंदुओं के लिए, विदेशी इस्लामी आक्रमणकारियों (मुस्लिम आक्रान्ताओं) द्वारा अतिक्रमित मंदिरों को मुक्त कराने के चल रहे प्रयासों की दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम है।

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