किंदम ऋषि (कर्दम ऋषि या कंदर्भ ऋषि) द्वापर युग में महाभारत काल में (द्वापर युग को त्रेता युग के बाद और कलियुग से पहले का मन जाता है) एक ऋषि थे, इनका उल्लेख महाभारत में हुआ है। किंदम ऋषि के श्राप को ही कुरु राज्यवंश के पतन और महाभारत के भीषण युद्ध की शुरुआत माना जाता है।
किंदम ऋषि की उतप्ति
किंदम ऋषि (कर्दम ऋषि) को ब्रह्मा के मानस पुत्र के रूप में जाना जाता है और उनकी उत्पत्ति छया से हुई थी। पुराणों अनुसार ब्रह्मा जी के मानस पुत्रों में मन से मारिचि, नेत्र से अत्रि, मुख से अंगिरस, कान से पुलस्त्य, नाभि से पुलह, हाथ से कृतु, त्वचा से भृगु, प्राण से वशिष्ठ, अंगुष्ठ से दक्ष, छाया से कंदर्भ, गोद से नारद, इच्छा से सनक, सनन्दन, सनातन, सनतकुमार, शरीर से स्वयंभुव मनु, ध्यान से चित्रगुप्त आदि हैं।

किंदम ऋषि के द्वारा स्वयंभुव मनु की द्वितीय कन्या देवहूति से विवाह करके 9 कन्या तथा एक पुत्र की उत्पति हुई थी इन दैवीय कन्या में कला, अनुसुइया, श्रद्धा, हविर्भू, गति, क्रिया, ख्याति, अरुन्धती और शान्ति तथा पुत्र का नाम कपिल था जो आगे चलकर कपिलमुनि कहलाए।
कपिलमुनि को भगवान विष्णु के अवतार के रूप में माना जाता है,और वे 24 अवतारों के क्रम में शामिल हैं।
हस्तिनापुर के राजा पाण्डु का वनविहार
राज्य के कार्यों से कुछ समय के लिए विराम लेकर महाराज पांडु अपनी पत्नियों के साथ प्रकृति के करीब रहकर कुछ समय पत्नियों के साथ बिताने के लिए राज्य से बाहर वन में जाने क निश्चय किया वहाँ सुरम्य वन में महाराज पांडु को मनुष्य जीवन और उसके सुखों का भोगने की लालसा हुई साथ ही उनके मन में विदुर के द्वारा कही बात याद आई और सोचा कि विदुर सही ही कह रहे थे कि कुछ दिनों के लिए राजकाज से दूर होकर भी जीवन बिताना चाहिए। महाराज पांडु जब वह इन ख्यालों में खोए हुए थे, तभी राज्य से संदेशवाहक द्वारा समाचार आया कि, धृतराष्ट्र और गांधारी जल्द ही माता-पिता बनने वाले हैं यह सुनकर पांडु बहुत खुश हुए।

पाण्डु ने खुशी-खुशी यह खबर अपनी पत्नियों को भी सुनाई, और बताया कि वह सघन वन में शिकार पर चल रहे हैं। राज्य के कामकाज और अन्य चिंताओं से दूर होकर उनके नाम में विचार आया कि अब पत्नी कुंती और माद्री के साथ भी अपनी पारिवारिक जिम्मेदारी पूरी करें और माता-पिता का सुख भोग कर राज्य को उत्तराधिकारी दें।
किंदम ऋषि
किंदम एक ऋषि थे और उनका आश्रम महाराज पांडु के वनवास के स्थान के नजदीक ही था। किंदम ऋषि (कंदर्भ ऋषि) बहुत ही शर्मीले स्वभाव के थे और उनकी इसी शर्म की भावना से वह पत्नी के साथ प्रणय करने से संकोच करते थे। इक बार प्रणय की इच्छा से वशीभूत होकर किंदम ऋषि ने शक्तियों का उपयोग कर स्वयं और अपनी पत्नी को हिरण के भेष में बदल लिया और प्रणयविहार के लिए विचरण करने लगे।
हस्तिनापुर के राजा पाण्डु जब वन में शिकार के लिए घूम रहे थे। तभी उन्हें हिरनों का एक जोड़ा दिखाई दिया तुरंत ही उन्होंने निशाना साधकर उन पर बाण चला दिए जिससे हिरन घायल हो गए।
राजा के बाणों से आहात हिरणों का वह जोड़ा कोई और नही वल्कि, किंदम ऋषि और उनकी पत्नी थे जो प्रणय विहार के लिए विचरण कर रहे थे। राजा के बाण से लहूलुहान हो किंदम ऋषि ने अपने वास्तविक स्वरूप में आकर महाराज पाण्डु को श्राप दिया कि तुमने अकारण मुझ पर और मेरी तपस्नी पत्नी पर उस समय बाण चलाए, जब हम विहार कर रहे थे। मैं तुम्हें श्राप देता हूँ कि, तुम जब कभी भी अपनी पत्नी के साथ प्रणय विहार करोगे तो उसी समय तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी।
महाराज पाण्डु को श्राप
पांडु, एक क्षत्रिय होने के नाते, एक ऋषि को मारने के पाप की गंभीरता जानते थे, और इस बात से बहुत परेशान होकर, वह अपनी कुटिया में लौटे और अपनी पत्नियों, कुंती और माद्री को पूरी घटना बताई, और ऋषि से मिले श्राप के बारे में समझाया। एक राजा के तौर पर, वह इतना बड़ा अक्षम्य अपराध करने के बाद हस्तिनापुर लौटने और सिंहासन पर बैठने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। इसके अलावा, श्राप के कारण, वह जानते थे कि वह कभी पिता नहीं बन पाएंगे। इसलिए, उन्होंने हस्तिनापुर संदेश भेजकर अपने राज-त्याग की घोषणा की और कहा कि धृतराष्ट्र तब तक राजा रहेंगे जब तक अगली पीढ़ी शासन करने के लिए तैयार नहीं हो जाती, और उन्होंने खुद को जंगल में वनवास के जीवन के लिए समर्पित कर दिया।
महाराज पाण्डु ने संदेशवाहक के माध्यम से यह संदेश हस्तिनापुर भी भेज दिया। यह सुनकर पितामह भीष्म और अन्य राजदारबरियों को बड़ा दु:ख हुआ। तब भीष्म ने महाराज पाण्डु के ज्येष्ट भाई धृतराष्ट्र (जो जन्म से देख न सकने के कारण राजा बनने के लिए अयोग्य थे) को राजा बना दिया। उधर पाण्डु अपनी पत्नियों के साथ गंधमादन पर्वत पर जाकर साधना करने लगे।
गंधमादन पर्वत पर पांडवों का जन्म
महाभारत के अनुसार ऋषि द्वारा दिए श्राप के कारण राजा पाण्डु स्वयं संतान उत्पन्न नहीं कर सकते थे, इसलिए उन्होंने महारानी कुंती और माद्री से देवताओं का आवाहन कर मंत्र शक्ति से पुत्र प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की, तदुपरांत देवताओं के आवाहन और ऋषि द्वारा कुंती को दिए गए मंत्र की शक्ति से गंधमादन पर्वत पर पाँच पांडव (युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव) उत्पन्न हुए।

वन में रहते कई वर्ष बीत जाने के बाद एक बार महारानी कुंती की अनुपस्थिति में महाराज पाण्डु की दूसरी पत्नी माद्री ने उनसे प्रणय निवेदन किया जिसको उन्होंने स्वीकार कर लिया लेकिन महाराज पाण्डु किन्डम ऋषि (किंदम ऋषि) के श्राप को भूल गये और ज्यों ही माद्री के साथ मिलन के लिए तैयार हुए तुरंत ही ऋषि श्राप के प्रभाव से उनकी मृत्यु हो गई।
किंदम ऋषि का विवाह
किंदम ऋषि (कर्दम ऋषि ; किन्डम ऋषि या कंदर्भ ऋषि) ने विवाह पूर्व सतयुग में परम पावनी सरस्वती नदी के किनारे भगवान विष्णु की घोर तपस्या की थी। उसी के फलस्वरूप भगवान विष्णु ने कपिलमुनि के रूप में किंदम ऋषि (कर्दम ऋषि) के यहां जन्म लिया था।
कहा जाता है कि, किंदम ऋषि (कर्दम ऋषि) विवाह नहीं करना चाहते थे परंतु भगवान विष्णु ने उन्हें मनु की पुत्री देहहूति से विवाह करने का आदेश दिया था।
भाग्य के विधान के वशीभूत होकर एक दिन स्वयंभुव मनु एक दिन अपनी पुत्री देवहुति को लेकर कर्दम ऋषि के आश्रम गए। स्वायंभुव मनु और उनकी पत्नी शतरूपा तो आसन पर बैठक गए परंतु बेटी देवहूति नहीं बैठी तो कर्दम ऋषि ने कहा कि देवी ये आपके लिए ही आसन बिछाया है आप यहां बैठे। देवहूति ने सोचा कि मैं अपने होने वाले पति के सामने उनके बिछाए आसन पर कैसे बैठ सकती हूं और नहीं बैठूंगी तो उनका अपमान होगा। यह सोचकर वह आसन पर अपना दाहिना हाथ रखकर आसन के पास बैठ गईं। यह देखकर कर्दम ऋषि ने सोचा कन्या विवाह योग्य है। इससे विवाह किया जा सकता है। इस तरह उनका विवाह हुआ। परंतु कर्दन ऋषि ने शर्त रखी थी कि पुत्र होने के बाद में ब्रह्मचर्य धारण करके संन्यास ले लूंगा। यह सुनकर भी देवहूति ने विवाह के लिए हां भर दी थी क्योंकि वह जानती थीं कि जिन ऋषि को भगवान विष्णु ने दर्शन दिए हैं उनके साथ कुछ समय रहना भी सौभाग्य है।
तेजस्वी कन्याओं का जन्म
किंदम ऋषि की नौ कन्याओं का और एक पुत्र का जन्म भी बड़ी विचित्र परिस्थिति में हुआ था। कहते हैं कि कर्दम ऋषि जप-तप में यह भूल ही गए कि उन्होंने विवाह भी किया है। किन्डम ऋषि आश्रम में रहकर पूर्णतः सन्यासी जीवन यापन करते और पत्नी देवहूति उनकी सेवा करती थी।
आश्रम में एक दिन कर्दम ऋषि ने कहा कि देवी मैं आपकी सेवा से प्रसन्न हूं, मांगों क्या मांगना चाहती हो, तब देवहूति ने कहा कि स्वामी! आप भूल गए कि आपने मुझे वचन दिया था पुत्र रत्न की प्राप्ति का।
यह सुनकर कर्दम ऋषि ने योगबल के द्वारा सुख सुविधाओं से सुसज्जित एक विमान का निर्माण किया पत्नी देवहूति सहित उसमें सवार होकर सम्पूर्ण धरती के भ्रमण के लिए चल पड़े और इसी भ्रमण के दौरान विमान में ही उनकी नौ कन्याओं कला, अनुसुइया, श्रद्धा, हविर्भू, गति, क्रिया, ख्याति, अरुंधती तथा शान्ति का जन्म हुआ।
कन्याओं के जन्म के पश्चात कर्दम ऋषि ने पुनः पत्नी देवहूति से पूछा कि क्या अब मैं संन्यास ले सकता हूँ? तब देवहूति ने कहा कि स्वामी! आपको संन्यास लेने से कौन रोक सकता है परंतु अभी भी आपका वचन पूरा नहीं हुआ है आपने पुत्र प्राप्त के बाद संन्यास लेने का बचन दिया था और अब इन कन्याओं के विवाह भी तो करना है। इस तरह कर्दम ऋषि पुन: संसार में उलझ गए।

किंदम ऋषि (कंदर्भ ऋषि) और देवहूति से उत्पन्न कन्याओं, कला, अनुसुइया, श्रद्धा, हविर्भू, गति, क्रिया, ख्याति, अरुंधती तथा शान्ति का विवाह क्रमश: मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, ऋतु, भृगु, वसिष्ठ तथा अथर्वा ऋषि मुनियों से सम्पन्न हुआ।
किंदम ऋषि और देवहूति से उत्पन्न पुत्र कपिलमुनि को रघुवंश का जनक मन जाता है जिसमें आगे चल कर भगवान श्रीराम ने जन्म लिया था।
